महात्मा बुद्ध ,बौद्ध धर्म एवं दर्शन (Part-1)

महात्मा बुद्ध ,बौद्ध धर्म एवं दर्शन
बुद्ध 

प्राचीन भारतीय इतिहास में छठी शताब्दी ईसा पूर्व का काल भारतीय समाज में प्रचलित यज्ञवाद, रूढ़िवादिता वैदिक कर्मकांड,  आडंबर बाद, ब्राह्मणों के नैतिक पतन के विरुद्ध आवाज उठाने काल था। इस काल में अनेक नास्तिक धार्मिक संप्रदायों का उदय हुआ जिन्होंने वैदिक कर्मकांडों का विरोध कर भारत में सामाजिक धार्मिक सुधार आंदोलन का सूत्रपात किया। इन्ही धर्मों में बौद्ध धर्म का नाम उल्लेखनीय है 



बौद्ध धर्म की स्थापना गौतम बुद्ध ने की थी






लुम्बिनी 
महात्मा बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व में कपिलबस्तु के निकट लुम्बिनी वन (आधुनिक रुम्मिनदेह) नामक स्थान में हुआ 




उनके पिता शुद्धोधन कपिलवस्तु के शाक्य गण के प्रधान थे इसलिए बुद्ध को शाक्यमुनि भी कहा जाता है 

इनकी माता माया देवी कोलिय गणराज्य की कन्या थी

माता के देहांत के बाद इनका पालनपोषण इनकी मौसी गौतमी ने किया था 

गौतम के बचपन का नाम सिद्धार्थ था 

16 वर्ष की आयु में इनका विवाह शाक्य कुल की कन्या यशोधरा से हुआ था 

यशोधरा से सिद्धार्थ को एक पुत्र की प्राप्ति हुई जिसका नाम राहुल पड़ा


सिद्धार्थ को सांसारिक विषय भोगी में वास्तविक संतोष नहीं मिला

बिहार के लिए जाते हुए उन्होंने प्रथम बार वृद्ध,  द्वितीय बार एक व्याधिग्रस्त मनुष्य, तृतीय बार एक मृतक और अंततः एक प्रसन्न चित्त सन्यासी को देखा

Four things watched by Buddha


इस घटना के बाद 29 वर्ष की आयु में सिद्धार्थ ने गृह त्याग दिया

इस त्याग को बौद्ध ग्रंथों में महाभिनिष्क्रमण की संज्ञा दी गई है।

महाभिनिष्क्रमण

ज्ञान प्राप्ति के लिए वह एक स्थान से दूसरे स्थान पर भ्रमण करने लगे।

आलार कालाम और बुद्ध  
सर्वप्रथम वैशाली के निकट आलार कालाम नामक सन्यासियों के आश्रम में उन्होंने तपस्या की।

बुद्ध के जीवन के प्रारम्भिक चरण में एक दार्शनिक और मार्गदर्शक की आवश्यकता थी जो उनको धम्म का मार्ग दिखाते । आलार कालाम एक प्रसिद्द तपस्वी थे जिनहोने झना या यज्ञ के आठ चरणों में से सात चरणों को जीत लिया था


6 वर्षों की तपस्या के बाद 35 वर्ष की आयु में बोधगया में वैशाख पूर्णिमा की रात में ऋजु पालिका नदी के तट पर पीपल के वृक्ष के नीचे 49वे दिन उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ और वे बुद्ध के नाम से विख्यात हुए।

बौद्ध ग्रन्थों में इस घटना को निर्वाण कहा गया ।


निर्वाण प्राप्त होना 

सारनाथ में उन्होंने सर्वप्रथम पांच सन्यासियों को अपना पहला उपदेश दिया 

इस प्रथम उपदेश को धर्म चक्र परिवर्तन की संज्ञा दी गई है। 


धर्म चक्र परिवर्तन

महात्मा बुद्ध ने तपस्स एवं मालिक नामक दो शूद्रों को बौद्ध धर्म का सर्वप्रथम अनुयायी बनाया

80 वर्ष की आयु में गौतम बुद्ध की मृत्यु 483 ईसापूर्व में मल्लों की राजधानी कुशीनगर में हुई थी। 

इस घटना को बौद्ध साहित्य में महापरिनिर्वाण की संज्ञा दी गई है।

महापरिनिर्वाण
बुद्ध ने अपने जीवन के सर्वाधिक उपदेश कौशल देश की राजधानी श्रावस्ती में दिया और मगध को अपना प्रचार केंद्र बनाया

बुद्ध के प्रसिद्द अनुयायाई शासकों बिंबिसार, प्रसेनजित तथा उदयन थे 

बौद्ध धर्म के प्रमुख सिद्धांत

चार आर्य सत्य


बौद्ध धर्म के प्रमुख सिद्धांत निम्नलिखित है

चार आर्य सत्य

चार आर्य सत्य

चार आर्य सत्य बौद्ध धर्म की आधारशिला है बौद्ध धर्म के अन्य सिद्धांतों का विकास इन आर्य सत्यों के आधार पर ही हुआ है

1. दुख
पृथ्वी पर सभी जगह दुख ही दुख है मनुष्य का जीवन दुखों तथा कष्टों से भरा हुआ है जिन्हें हम सुख समझते हैं वे भी दुखों से भरे हुए हैं हमारे मन में हमेशा ही डर बना हुआ है कि हमारे आनंद कहीं समाप्त ना हो जाए।  आनंद की समाप्ति पर कष्ट होता है।  आसक्ति से भी दुख उत्पन्न होते हैं अतः हम कह सकते हैं कि जीवन दुखों से परिपूर्ण है

2. दुख समुदाय
प्रत्येक वस्तु का कोई न कोई कारण अवश्य होता है अतः दुख का भी कारण है क्योंकि कोई भी वस्तु बिना किसी कारण के नहीं हो सकती है प्रतीत्यसमुत्पाद के अनुसार विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है कि दुख का मूल कारण अज्ञान है संसार के समस्त दुखों का सामूहिक नाम ज़रामरण है । जरा मरण से लेकर अविधा तक दुख समुदाय में 12 कड़ियां बताई गई है

3. दुख निरोध
जिस प्रकार संसार में दुख है और दुख के कारण है । उसी प्रकार दुख निरोध (दुख से छुटकारा) भी संभव है ।  दुख के मूल कारण तृष्णा के मूलोच्छेदन से दुख से छुटकारा मिल सकता है । उनका कहना था कि संसार में जो कुछ भी प्रिय लगता है संसार में जिसमें रस मिलता है उसे तो दुख स्वरूप समझेंगे और उनसे डरेंगे । वे ही तृष्णा को छोड़ सकते हैं ।रूप, वेदना , संज्ञा, संसार और विज्ञान का विरोध ही दुख निरोध हैं ।

4. दुख निरोध मार्ग
यह दुखों पर विजय प्राप्त करने का मार्ग है । कोई व्यक्ति इस मार्ग का अनुसरण कर कर दुखों पर विजय प्राप्त कर सकता है बुद्ध ने जो मार्ग बतलाया वह दुख निरोध गामिनी प्रतिपदा के नाम से विख्यात है 
इसमें 8 अंगों की व्यवस्था है इसे अष्टांगिक मार्ग भी कहते हैं

मध्य प्रतिपदा
महात्मा बुद्ध ने दुखों से मुक्ति का जो अष्टांगिक मार्ग बतलाया था, वह विशुद्ध आचार्य तत्वों पर आधारित था । 

उसमें ना तो शारीरिक कष्ट एवं क्लेश से युक्त कठोर तपस्या को उचित बताया गया और ना ही अत्यधिक संसारिक भोगविलास को।  वस्तुतः वह दोनों अतियों के बीच का मार्ग था । 

इसी को मध्य प्रतिपदा मार्ग या मध्यम मार्ग भी कहा गया है। 

इसके पालन से मनुष्य निर्माण पथ की ओर अग्रसर हो सकता है

अष्टांगिक मार्ग 


अष्टांगिक मार्ग


अष्टांगिक मार्ग को जीवन यापन के बीच का मार्ग या मध्यम मार्ग कहा जाता है 


अष्टांगिक मार्ग


सम्यक दृष्टि 
अष्टांगिक मार्ग
पाप -पुण्य,  सत्य -असत्य, सदाचार और दुराचार में अंतर करना ही सही सही ज्ञान है 
इसी से चार आर्य सत्यों का सही सही ज्ञान प्राप्त होता है । यह ज्ञान श्रद्धा और भावना से युक्त होना चाहिए 

सम्यक संकल्प 
हिंसा और कामना से मुक्त आत्मकल्याण का पक्का निश्चय ही सम्यक संकल्प है 

सम्यक वाणी 
विनम्र सत्य और मृदु वचन तथा वाणी पर संयम सम्यक वाणी है 

सम्यक कर्मान्त
सब कर्मों में पवित्रता रखना, हिंसा, द्रोह तथा दुराचरण  से बचते रहना और सत्य कर्म करना 

सम्यक आजीव 
न्यायपूर्ण मार्ग से आजीविका चलाना । जीवन निर्वाह से निषद्द मार्गों का त्याग करना 

सम्यक प्रयास 
इसे सम्यक व्यायाम भी कहते हैं इसका अर्थ है सतकर्मों के लिए निरंतर उद्धम करते रहना 

सम्यक स्मृति 
लोभ आदि चित्त के संतापों से बचना तथा उत्तम शिक्षाओं को सदैव याद रखान 

सम्यक समाधि 
रोग तथा द्वेष से रहित होकर चित्त की एकाग्रता को बनाए रखना

दस शील

दश शील को बौद्ध धर्म में सदाचार का नियम भी बताया जाता है यह निम्न प्रकार से है
1. अहिंसा व्रत का पालन करना
2. अस्तेय अर्थात चोरी न करना
3.  ब्रह्मचर्य अथार्थ भोग विलास से दूर रहना
4. सदा सत्य बोलना
5. अपरिग्रह अर्थात वस्तुओं का संग्रह ना करना
6. नृत्य गान का त्याग
7. असमय भोजन ना करना
8. सुगंधित पदार्थों का त्याग
9. कोमल शैया का तयाग
10. कामिनी कांचन का त्याग

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