हड़प्पा संस्कृति (Part-4):लिपि, जीवन, और पतन


हड़प्पा लिपि


इसमें में लगभग 64 मूल चिन्ह है 

इस लिपि का सबसे पुराना नमूना 1853 में मिला था और 1923 में तक पूरी लिपि प्रकाश में आ गई थी

परंतु अभी तक इसको नहीं पढ़ा जा सकता है

इसकी लिपि को पिक्टोग्राफ अर्थात चित्रात्मक कहा जाता था  जो दाईं ओर से बाईं ओर लिखी जाती थी

इस पद्दती को बूस्ट्रोफेडन (Boustrophedon) कहा जाता है

सबसे ज्यादा चित्र U आकार और मछली के प्राप्त हुए हैं

सामाजिक जीवन

सिंधु घाटी से प्राप्त अवशेषों के आधार पर उस काल के सामाजिक जीवन का अनुमान लगाया जा सकता है




समाज की इकाई परिवार थी

मातृ देवी की पूजा की जाती थी

मुहरों पर अंकित चित्र से पता चलता है कि हड़प्पा समाज मातृसत्तात्मक था। 

समाज में विद्वान, पुरोहित, योद्धा, व्यापारी, और श्रमिक वर्ग होते थे

आवासों की संरचना से समाज की आर्थिक विषमता का मालूम पड़ता हैं 

हड़प्पावासी साज-सज्जा पर विशेष ध्यान देते थे। स्त्री एवं पुरुष दोनों आभूषण धारण करते थे यहां से प्रसाधन मंजूषा मिली है



चंहूदारो से  लिपस्टिक के साक्ष्य मिले हैं

सिंधु सभ्यता के लोग सूती व ऊनी दोनों प्रकार के वस्त्रों का उपयोग करते थे

इस सभ्यता के लोग शाकाहारी और मांसाहारी दोनों प्रकार का भोजन करते थे

यहां के लोग मनोरंजन के लिए चौपड़ और पासा खेलते थे

अंत्येष्टि में पूर्ण समाधिकरण सर्वाधिक प्रचलित था जबकि आंशिक समाधिकारण एवं संस्कार का भी चलन था

यहां के लोग गणित,धातु निर्माण, माप तोल प्रणाली, ग्रह-नक्षत्र, मौसम विज्ञान इत्यादि की जानकारी रखते थे।



सेंधव सभ्यता के लोग युद्धप्रिय कम व शांतिप्रिय ज्यादा थे

दास प्रथा का चलन था 

राजनीतिक जीवन

हड़प्पावासी वाणिज्य व व्यापार की ओर अधिक आकर्षित थे

शासन व्यवस्था में भी वणिक अथवा व्यापारी वर्ग की भूमिका महत्वपूर्ण थी

मोहनजोदड़ो का शासन जनतंत्रात्मक था

शासन में धर्म की महत्ता थी

आर्थिक जीवन

सेंधव सभ्यता की उन्नति का प्रमुख कारण उन्नत कृषि तथा व्यापार था

अतः इस काल की अर्थव्यवस्था, पशुपालन, विभिन्न दस्तकारिता ,आंतरिक और विदेश व्यापार पर आधारित थी

सेंधव सभ्यता का व्यापार केवल सिंधु क्षेत्र तक ही सीमित नहीं था बल्कि मिस्र मेसोपोटामिया और मध्य एशिया से भी व्यापार होता था


सेंधव सभ्यता के प्रमुख बंदरगाह लोथल, रंगपुर, सुरकोटदा, प्रभास पाटन आदि थे

हड़प्पा सभ्यता में माप की दशमलव प्रणाली और माप तौल की इकाई 16 के गुणक में होती थी

इस सभ्यता के लोग गेहूं, जौं, मटर, तिल, सरसों, कपास आदि की खेती किया करते थे

सबसे पहले कपास पैदा करने का श्रेय सिंधु सभ्यता के लोगों को दिया जाता है, यूनानियों ने इसे सिंडन (सिडोन) नाम दिया है

यह लोग तरबूज, खरबूज, नारियल, अनार, नींबू, केला जैसे फलों से परिचित थे

यहां के प्रमुख खदान गेहूं तथा जौं थी

कृषि कार्य हेतु  पत्थर एवं कांसे के औजारों का प्रयोग किया जाता था

इस सभ्यता में हावड़ा या फाल नहीं मिला है यह लोग लकड़ी की हलों का प्रयोग करते थे

सेंधव नगरों में कृषि पदार्थों की आपूर्ति ग्रामीण क्षेत्रों से होती थी इसलिए अन्नागार नदियों के किनारे बनाए गए थे

कृषि उन्नति के साथ पशु पालन का भी विकास हुआ था। कृषि कार्य एवं व्यापार तथा परिवहन में पशुओं की महत्वपूर्ण भूमिका थी। पशुओं में कूबड़ वाले बैल, भेड़, बकरी, हाथी, भैंस, गाय, गधे, सूअर और कुत्ते आदि के होने का अनुमान है

गुजरात के निवासी हाथी पालते थे

धार्मिक जीवन

सैंधव निवासी ईश्वर की पूजा मानव, वृक्ष व पशु तीनों रूप में करते थे

इस सभ्यता के लोग भूत प्रेत तंत्र मंत्र आदि में विश्वास करते थे

जादू टोने में विश्वास करने और बलि प्रथा का भी अनुमान है

यह लोग मातृदेवी, रुद्र देवता (पशुपतिनाथ) व  लिंग-योनि की पूजा करते थे



इसके वृक्ष, पशु, सांप, पक्षी इत्यादि की भी पूजा करते थे

विशाल स्नानागार का प्रयोग धार्मिक अनुष्ठान के लिए या सूर्य पूजा में होता होगा

कालीबंगा से प्राप्त अग्निकुंड के साक्ष्य के आधार पर यह कहा जा सकता है कि अग्नि तथा स्वस्तिक की पूजा की जाती थी

स्वस्तिक व चक्र सूर्य पूजा के प्रतीक थे

ये लोग पुनर्जन्म में विश्वास करते थे इसलिए मृत्यु के बाद दाह संस्कार के 3 तरीके प्रचलित थे जैसे - पूर्ण समाधान, आंशिक समाधान, एवं कलश समाधान

मूर्ति पूजा का आरंभ सैंधव सभ्यता से ही होता है

हड़प्पा से प्राप्त एक मूर्ति के गर्भ से एक पौधा निकलता हुआ दिखाया गया है जो उर्वरता की देवी का प्रतीक है

सिंधु सभ्यता के पतन के कारण

हड़प्पा सभ्यता की उत्पत्ति की तरह इसके पतन के लिए भी कोई एक कारण उत्तरदाई नहीं था

इस सभ्यता का क्रमिक पतन हुआ तथा यह नगरी सभ्यता से ग्रामीण सभ्यता में पहुंच गई

सैंधव सभ्यता की देन

सभ्यता में प्रचलित अनेक चीजे अभी भी प्रचलित हैं जैसे कि दशमलव पद्धति पर आधारित माप तोल प्रणाली, नगर नियोजन सड़कें एवं नालियों की व्यवस्था, बहुदेव वाद का प्रचलन, मातृ देवी की पूजा, प्रकृति की पूजा, शिव पूजा, लिंग योनि पूजा,  योग का प्रचलन, जल का धार्मिक महत्व, स्वस्तिक और चक्र आदि के प्रतीक के रूप में ताबीज,  तंत्र मंत्र का प्रयोग, आभूषण का प्रयोग, बहुफसली कृषि व्यवस्था, अग्नि पूजा या यज्ञ, मुहरों का उपयोग, बैल गाड़ी, आंतरिक और बाह्य व्यापार आदि

एक प्रमुख देन नगरीय जीवन के क्षेत्र में है, पूर्ण विकसित नगरीय जीवन का सूत्रपात इसी सभ्यता में हुआ था

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