वैदिक सभ्यता (Part-3): उत्तर वैदिक काल

उत्तर वैदिक काल (1000-600 ई पू )


इस काल में धर्म, दर्शन, नीति, आचार-विचार, मत विश्वास आदि की रूपरेखा निश्चित हो गयी

उत्तर वैदिक काल के अध्ययन के लिए निम्न स्त्रोत थे :

1. यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद,
2. ब्राह्मण ग्रंथ उपनिषद, और आरण्यक
3. चित्रित धूसर मृदभांड (Printed Grey Ware)

लौह युग की शुरुआत भी उत्तर वैदिक काल से मानी जाती हैं

भौगोलिक विस्तार 

उत्तर वैदिक काल में आर्यों का सदानीरा (गंडक) के पूर्व की ओर प्रसार था

Later Vedic Period, उत्तर वैदिक कालीन क्षेत्र 

सभ्यता का केंद्र पंजाब से बढ़कर कुरुक्षेत्र (दिल्ली और गंगा - यमुना दोआब का उत्तरी भाग ) तक आ गया था

600 ई पू के आस पास आर्य लोग कोशल, विदेह, एवं अंग राज्य से परिचित थे

उत्तर वैदिक कालीन रेवा (नर्मदा) और सदानीरा (गंडक) नदियों का उल्लेख मिलता है

त्रिककुद, क्रौंच, मैनाक, आदि पर्वतों का उल्लेख हैं जो पूर्वी हिमालय में पड़ते हैं

सामाजिक स्थिति 

सामाजिक व्यवस्था का आधार वर्ण व्यवस्था ही था , पर वर्ण व्यवस्था में कठोरता हो गयी थी

अब वर्ण का आधार कर्म न होकर जन्म हो गया था

अनेक धार्मिक श्रेणियों का उदय हुआ

व्यवसाय आनुवांशिक हो गया

समाज में चार वर्ण थे :

वर्ण व्यवस्था 


1. ब्राह्मण : एहि (आइये) से बुलाया जाता था

2. क्षत्रिय : आगहि (आओ) से बुलाया जाता था

3. वैश्य : आद्रव (जल्दी आओ) से बुलाया जाता था

4. शूद्र : आधाव (दौड़कर आओ) से बुलाया जाता था

ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों को द्विज़ कहा जात था , ये उपनयन संस्कार के अधिकारी थे

शूद्र : अपात्र या आधारहीन माना जाता था , ये उपनयन संस्कार के अधिकारी नहीं थे

यज्ञ का महत्व बढ़ जाने से ब्राह्मणों की महत्ता बढ़ गयी

एतरेय ब्राह्मण के अनुसार , वैश्य कर चुकाते थे।

ब्राह्मण और क्षत्रिय, वैश्यों के चुकाए कर पर जीते थे।

निचला वर्ण शूद्र था , जिसका कार्य तीनों वर्णों की सेवा करना था

स्त्रियॉं की दशा 

स्त्रियॉं की दशा में गिरावट आई , उपनयन संस्कार प्रतिबंधित हो गया

एतरेय ब्राह्मण के अनुसार , पुत्री को  कृपण कहा जाता था

पैतृक संपत्ति का अधिकार छिन गया था

सभा में स्त्रियॉं का प्रवेश वर्जित हो गया

शतपथ ब्राह्मण में कुछ विदुषी कन्यायों का उल्लेख मिलता था : जैसे गार्गी, गृहीता, मैत्रेयी , वेदवती, काश्कृत्सनी आदि

समाज 

पारिवारिक जीवन ऋग्वेद जैसा ही था जिसमें स्त्रियॉं को कुछ पारिवारिक अधिकार प्राप्त थे , पर समाज पित्रसत्तात्मक था


गोत्र व्यवस्था स्थापित हुई

गोत्र = वह स्थान जहां समूचे गोधन को एक साथ रखा जाता था , परंतु बाद में इस शब्द का अर्थ एक मूल पुरुष का वंशज हो गया

चारो आश्रम का विवरण मिलता हैं:

आश्रम व्यवस्था 

1. ब्रह्मचर्य
2. ग्रहस्थ
3. वानप्रस्थ
4. सन्यास

सोलह संस्कार प्रचलित थे:

सोलह संस्कार 


1. गर्भधान
2. पुंसवन
3. सीमांतोन्नयन
4. जातकर्म
5. नामकरण
6. निष्कृमन
7. अन्नप्राशन
8. चूड़ाकर्म
9. कर्ण वेधन
10. विधारम्भ
11. उपनयन
12. वेदारंभ
13. केशांत या गोदान
14. समावर्तन
15. विवाह
16. अंतयेष्टि

विवाह के प्रकार 

मनुस्मृति में विवाह के आठ प्रकारों का उल्लेख मिलता हैं



प्रशंसनीय विवाह 

1. ब्रह्म : 

कन्या के बड़े होने पर माता  पिता द्वारा योग्य वर ढूंढकर विवाह करना

2.दैव :

यज्ञ करने वाले पुरोहित के साथ विवाह करना

3. आर्य :

कन्या के पिता द्वारा यज्ञ कार्य हेतों एक या दो गाय के बदले अपनी पुत्री का विवाह करना

4. प्रजापत्य 

वर स्वम कन्या के पिता से कन्या मांग कर विवाह करना


निंदनीय विवाह 

5. आसुर

कन्या के पिता द्वारा धन के बदले विवाह करना

6. गंधर्व 

प्रेम या काम के वशीभूत होकर कन्या या पुरुष द्वारा विवाह

7. पैशाच 

सोई हुई या विक्षिप्त कन्या के साथ सहवाह कर विवाह करना

8. राक्षस 

बलपूर्वक कन्या को छीनकर उससे विवाह करना



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