गुप्त साम्राज्य (335 – 455 ई)

गुप्त वंश (Gupta Dynasty)


गुप्त साम्राज्य (335 – 455 ई)
कुषाण काल के खंडहर पर गुप्त साम्राज्य का प्रादुर्भाव हुआ। गुप्त साम्राज्य का राज्य क्षेत्र कुषाण और सातवाहन दोनों के पिछले राज्यक्षेत्र के बहुत बड़े भाग पर स्थापित किया। पर इनका मौर्य साम्राज्य जैसा विशाल साम्राज्य नहीं था

गुप्त मूलत: वैश्य थे और शायद कुषाणों के सामंत थे।

गुप्त वंश के आरंभिक राज्य उत्तर प्रदेश और बिहार था जहां से गुप्त शासक कार्य संचालन करते थे और वहीं से अनेकों दिशाओं में बढ़ते गए। कुषाणों से प्राप्त तकनीक एवं वैवाहिक सम्बन्धों से गुप्त साम्राज्य और सुदृढ़ हुआ।  
Gupt Dyansty 

सत्ता का केंद्र प्रयाग को बनाया। 

उत्तर प्रदेश में अधिकांश अभिलेख जैसे आरंभिक गुप्त मुद्राएँ और अभिलेख मिले हैं

गुप्त लोग कुषाणों के सामंत थे और थोड़े दिन में उनके उत्तराधिकारी बन बैठे

बिहार और उत्तर प्रदेश में अनेक कुषाण पुरावशेषों के ठीक बाद गुप्त पुरावशेष मिले हैं

गुप्तों ने जीन, लगाम, बटन वाले कोट, पतलून और जूतों का इस्तेमाल कुषाणों से सीखा

कुषाणों में घुड़सवारों की भूमिका प्रमुख थी और अश्वचलित रथ और हाथी का महत्व समाप्त हो गया था

गुप्तों में घुड़सवारों की भूमिका प्रमुख थी इसलिए सिक्कों पर घुड़सवार अंकित हैं

गुप्तों की शक्ति का मूल आधार घोड़ों का इस्तेमाल था , इनको उत्तम महारथी (रथ पर लड़ने वाला ) कहा गया हैं

इनके कार्य कलाप का मुख्य प्रांगण मध्य प्रदेश की उर्वर भूमि था जिसमे बिहार और उत्तर प्रदेश आते हैं

वे मध्य भारत और दक्षिण बिहार के लौह अयस्क का उपयोग करते थे

बायजेंटाइन साम्राज्य (पूर्वी रोमन साम्राज्य) के साथ रेशम का व्यापार करने वाले उत्तर भारत के इलाके उनके पड़ोस में पड़ते थे इसलिए वे इस निकटता का लाभ उठा सके।

इन सब अनुकूल परिस्थियों के कारण गुप्त शासकों ने अपना अधिपत्य अनुगंग ( मध्य गंगा का मैदान), प्रयाग (आधुनिक इलाहाबाद), साकेत (आधुनिक अयोध्या), और मगध पर स्थापित किया

उत्तर भारत में कुषाण सत्ता 230 ई के आसपास जाकर समाप्त हो गयी तब मध्य भारत पर मुरुण्डो का कब्जा हो गया , 250 ई तक मुरुण्डो ने राज किया

25 वर्षो बाद गुप्त वंश का हाथ में सत्ता चली गयी

चन्द्र गुप्त प्रथम (319-334 ई)
चन्द्रगुप्त प्रथम

यह पहला राजा था जिसे गुप्त वंश का वास्तविक संस्थापक कहा जाता है। वो एक महान राजा था जिसने 319 ई में अपने राज्यारोहण के स्मारक के रुप मे गुप्त संवत चलाया। 

इसने एक लिच्छवि राजकुमारी कुमारदेवी से विवाह किया जो नेपाल की थी और अपने स्वर्ण सिक्के पर कुमारदेवी का नाम अंकित कराया।

शादी के कारण इसकी सत्ता को बल मिला

गुप्त लोग वैश्य थे इसलिए क्षत्रिय कुल में विवाह करने के कारण उसकी प्रतिष्ठा बढ़ी


समुद्रगुप्त (335-375 ई)
समुद्रगुप्त 

यह चन्द्रगुप्त प्रथम का पुत्र था। इसने अपने राज्य का अपार विस्तार किया।

अशोक की नीति के विरुद्द यह हिंसा और विजय में आनंद पाता था

उसका दरबारी कवि हरिषेण था जिसके अनुसार समुद्रगुप्त एक आश्रयदाता था

इलाहाबाद का अशोक स्तम्भ के अभिलेख में एक कवि ने गिनाया है कि समुद्रगुप्त ने किन किन राजाओं और देशों पर विजय प्राप्त की। अशोक स्तम्भ पर संस्कृत भाषा में समुद्रगुप्त के संधि विग्रहक हरिषेण ने प्रशंसात्मक वर्णन प्रसूत किया है जिसे प्रयाग प्रशस्ति कहा जाता है।

जीते गए राज्य को पाँच समूहों में बांटा गया है =
1.   गंगा यमुना दोआब के राजाओं के क्षेत्र
2.   पूर्वी हिमालया के राज्य और सीमावर्ती राज्य जैसे नेपाल, असम, बंगाल आदि , पंजाब के कुछ गणराज्य , जो गणराज्य मौर्यो के खंडहरों पर टिमटिमा रहे थे उनको समुद्र गुप्त ने सदा के लिए बुझा दिया
3.   अटाविक राज्य (जंगली क्षेत्रो में स्थित राज्य) >> विंध्य क्षेत्र के
4.   पूर्वी दक्कन और दक्षिण भारत के 12 शासक जिन्हे हराकर छोड़ दिया गया, तमिलनाडू में कांची तक पहुंचा और पल्लवो से अपनी प्रभुत्ता स्वीकार करवाई
5.   शकों और कुषाणों (इनमे से कुछ अफगानिस्तान में राज करते थे ) >> इनको पदच्युत किया और सुदूर देश के शासकों को अपने अधीन किया

समुद्रगुप्त की प्रतिष्ठा भारत के बाहर भी थी। श्रीलंका के राजा मेघवर्मन ने गया मे बुद्द मंदिर बनाने के लिए दूत भेजा था जिसकी अनुमति दे दी गयी और यह मंदिर विशाल बौद्द विहार के रूप में विकसित हो गया।

इलाहाबाद की प्रशस्ति (प्रशंसात्मक अभिलेख) के अनुसार  समुद्रगुप्त कभी नहीं हारा था। उसके युद्द कौशल और बहादुरी के कारण वी ए स्मिथ (V. A. Smith) ने समुद्रगुप्त को भारत का नेपोलियन कहा है ।

इसके कुछ सोने के सिक्के मिले है जिन पर काँच नाम उत्कीर्ण है।

प्रयाग प्रशस्ति में समुद्रगुप्त को “लिच्छवि दौहित्र” भी कहा गया है।

समुद्रगुप्त विजेता के साथ साथ कवि, संगीतज्ञ तथा विध्या का संरक्षक था। उसके सिक्कों पर उसे वीणा बजते हुए दिखाया गया है। तथा उसे कविराज की उपाधि दी गयी हैं।

उसने महान बौद्द भिक्षु वसुबंधु को संरक्षण दिया था।   

चन्द्रगुप्त द्वतीय (375-415 ई)
चन्द्रगुप्त द्वितीय -विक्रमादित्य 

चन्द्रगुप्त से पहले एक और शासक रामगुप्त का गुप्त शासक का नाम प्रकाश में आता है जो बहुत ही दुर्बल शासक था। विशाखदत्त कृत नाटक देवीचंद्रगुप्त में भी रामगुप्त का नाम अंकित है।

चन्द्रगुप्त द्वितीय ने रामगुप्त की विधवा पत्नी ध्रुवदेवी से विवाह कर लिया था।

इसके शासन काल में गुप्त साम्राज्य शीर्ष पर पहुंचा । वैवाहिक संबंध और विजय के सहारे साम्राज्य की सीमा बढ़ाई।

प्रभावती चन्द्रगुप्त की बेटी थी जिसका विवाह वाकाटक राजा रुद्रसेन द्वितीय से कराया जो ब्राह्मण जाति का था और मध्य भारत में शासन करता था। उसके मरने के बाद उसका नाबालिग पुत्र उत्तराधिकारी बना। इस प्रकार प्रभावती वास्तविक शासिका हुई। इसके भूमिदान संबंधी अभिलेख के अनुसार प्रभावती अपने पिता के हित में काम करती थी। इस प्रकार मध्य भारत स्थित वाकाटक पर चन्द्रगुप्त का अप्रत्यक्ष रूप अपना प्रभाव जमाया

चन्द्रगुप्त द्वितीय ने अपने पुत्र का विवाह कदम्ब राजवंश में किया। 
  
चन्द्रगुप्त द्वितीय ने पश्चिमी मालवा और गुजरात पर अधिकार किया। यहाँ 400 साल पुराने शक क्षत्रपों के शासन का अंत किया, इससे पश्चिमी समुद्री तट मिला जो व्यापार वाणिज्य के लिए मशहूर था।

उज्जैन = को दूसरी राजधानी बनाया

दिल्ली के कुतुबमीनार के पास के लौह स्तम्भ के अभिलेख में चन्द्र नामक राजा का कीर्तिमान किया गया है >> इसको चन्द्रगुप्त द्वितीय माना गया है >> गुप्त साम्राज्य को पश्चिमोत्तर भारत और बंगाल के काफी भाग में फैलाया

चन्द्रगुप्त द्वितीय  ने विक्रमादित्य, विक्रमांक और परमभागवत की उपाधि धारण की।  विक्रमादित्य की  उपाधि 57 ई पू में उज़्जैन के शासक ने भी शक क्षत्रपों पर विजय पाने के उपलक्ष्य में धारण की थी।  

उज्जैन में राजदरबार था जिसमें कालीदास और अमरसिंह जैसे बड़े बड़े विद्वान थे। इसके अलावा धन्वंत्वरि, क्षपणक, शंकु, वेताल, भट्ट, घटकर्पर, वराहमिहिर, वररुचि जैसे नवरत्न भी थे।

सचिव = वीरसेन शैव था

सेनापति =आमक्रार्दव बौद्द था

उसके समय में चीनी यात्री फा-हियान भारत आया, वो 399-414 ई तक यहाँ रहा और उसने भारत के लोगों के जीवन के बारे विस्तृत वर्णन किया।

उसके समय में पाटलीपुत्र और उज्जयिनी शिक्षा के प्रमुख केंद्र थे।

कुमारगुप्त प्रथम (415 – 455 ई)
कुमारगुप्त 

कुमारगुप्त प्रथम के अंतिम दिनों में पुष्यमित्र नामक जातियों ने  आक्रमण किया, स्कंदगुप्त पुष्यमित्रों को पराजित करने में सफल रहा।

कुमारगुप्त प्रथम ने नालंदा विश्वविध्यालय की स्थापना कराई। उसने महेन्द्रादित्य, श्रीमहेन्द्र और अश्वमेघ आदि उपाधियाँ धरण की।

उसके समय की गुप्तकालीन मुद्राओं का सबसे बढ़ा ढेर बयाना (राजस्थान) में प्राप्त हुआ है, जिसमे मयूर शैली की मुद्राए सबसे महत्वपूर्ण थी ।

 स्कंदगुप्त (455-467 ई)
स्कंदगुप्त 

यह अंतिम प्रतापी शासक था। इसने 466 ई में चीनी सांग सम्राट के दरबार में अपना राजदूत भेजा था।  

कहौम  अभिलेख के अनुसार इसने शक्रादित्य की उपाधि धरण की थी।

स्कंदगुप्त के उत्तराधिकारियों में बुद्धगुप्त सबसे अधिक शक्तशाली था। वह बौद्ध अनुयाई था।

स्कंदगुप्त ने मौर्यो द्वारा निर्मित सुदर्शन झील का जीर्णोद्वार कराया। इसके पुनरुद्दार का कार्य सौराष्ट्र के गवर्नर पर्णदत्त के पुत्र चक्रपालित को सौपा था।

ईसा की 5वी सदी के उत्तरार्ध में मध्य एशिया के हूणों के आक्रमण का सामना करना पड़ा। स्कंदगुप्त ने हूणो को भारत में बढ़ने से रोका । 455 ई में स्कंदगुप्त ने हूणों को पराजित किया। इस प्रकार हूणों से भारत की सुरक्षा करने के श्रेय स्कंदगुप्त को ही है।

इसने पुष्यमित्रों के विद्रोह को भी समाप्त किया।

गुप्त वंश के शासक भानुगुप्त के समय सती प्रथा का प्रथम साक्ष्य 510 ई के एरण लेख में मिलता है।

गुप्त वंश का अंतिम शासक विष्णु गुप्त था। 570 ई में गुप्त साम्राज्य का पतन हो गया।




गुप्त साम्राज्य का पतन (हूणों का आक्रमण)

चन्द्रगुप्त द्वितीय के उत्तराधिकारी को ईसा की 5वी सदी के उत्तरार्ध में मध्य एशिया के हूणों के आक्रमण का सामना करना पड़ा। स्कंदगुप्त ने हूणो को भारत में बढ़ने से रोका पर उसके उत्तराधिकारी कमजोर थे।  

हूण घुड़सवारी में बेजोड़ थे, वे धातु के बने रकाबों का इस्तेमाल करते थे।  इस कारण तेजी से बढ़ते थे और उत्तम धनुर्धर थे ।

485 में हूणों ने पूर्वी मालवा और मध्य भारत के बड़े हिस्से पर कब्जा किया >> यहाँ उनके अभिलेख पाये गये है >> पंजाब और राजस्थान पर भी हूणों का कब्जा हो गया।

6वी सदी के आरंभ में गुप्त साम्राज्य छोटा हो गया। यशोधर्मन ने जल्दी हूणों की सत्ता को उखाड़ फेंका

पर मालवा नरेश ने गुप्त शासकों की सत्ता को चुनौती दी और सारे उत्तर भारत में अपना प्रभुत्व स्थापित किया।  532 ई में विजय स्तम्भ खड़े किए और गुप्त साम्राज्य को हिला दिया

करद सामंत: गुप्त राजाओं को और कमजोर बनाया

गुप्त साम्राज्य के शासनाध्यक्ष लोगों (गवर्नर) ने और उनके सामंतों के अपने को स्वतंत्र बनाना शुरू किया। मगध के परवर्ती गुप्त शासकों नें भी बिहार में अपनी शक्ति जमाई। 

मौखरि वंश: के लोगों ने बिहार और उत्तर प्रदेश मे राजसत्ता स्थापित की और कन्नौज को राजधानी बनाया। 550 ई  तक बिहार और उत्तर प्रदेश गुप्त शासकों के हाथ से निकल गए।  

6वी सदी के आरंभ में उत्तरी मध्य प्रदेश के स्वाधीन शासकों ने भूमिदान का शासनपत्र जारी करने लगे  पर शासन पत्र में गुप्त संवत का ही उपयोग किया

वलभी शासक : गुजरात और पश्चिमी मालवा पर अधिकार किया

स्कन्द गुप्त के बाद (467 ई  के बाद) कोई अभिलेख और मुद्रा नहीं मिली मिली हैं

5वी सदी के अंत तक पश्चिमी भारत गुप्त शासकों के हाथ से निकल गया। उनकी व्यापार और वाणिज्य वाली आय खतम हो गयी और वे आर्थिक पंगु हो गए ।

थानेश्वर के राजाओं: ने हरियाणा पर अधिकार किया और कन्नौज की ओर बढ़े   

ग्राम दान की परिपाटी जोर पकड़ी >> आमदनी घटी >>> विदेश व्यापार की आय घटी >> विशाल सेना के वेतन में कठिनाई >> गुजरात में व्यापार का लाभ खतम >> फिर स्वर्ण मुद्राओं से सोने का अनुपर कम किया गया >> पर कोई फायदा नहीं हुआ 

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