हर्ष और उसका काल (606-647 ई)


harsh vardhan dynasty


गुप्त वंश ने उत्तर आर पश्चिम भारत पर 6वी सदी के मध्य 160 वर्ष राज्य किया, उनका सत्ता केंद्र उत्तर प्रदेश और बिहार था और उसके बाद उत्तर भारत अनेक राज्यों में बंट गया। 

गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद हरियाणा के अंबाला जिले के थानेश्वर नमक स्थान पर वर्द्धन वंश की स्थापना हुई। यह वंश हूणों के साथ हुए अपने संघर्ष के कारण प्रसिद्द हुआ। 

इस वंश में नरवर्द्धन , राजवर्द्धन, आदित्यवर्द्धन एवं प्रभाकरवर्द्धन शासक हुए। 

प्रभाकरवर्द्धन के दो पुत्र राज्यवर्द्धन एवं हर्षवर्द्धन तथा पुत्री राज्यश्री थी। 


हर्ष और उसका काल (606-647 ई) 

हर्ष और उसका साम्राज्य 


प्रभाकरवर्द्धन के बाद राज्यवर्द्धन शासक बना पर उसकी हत्या मालवराज देव गुप्त एवं गौड़ शासक शशांक ने मिलकर कर दी और राज्यश्री को कन्नौज में गिरफ्तार कर लिया गया। 

तब हर्ष वर्द्धन राजा बना। 

हर्ष ने दिवाकर मित्र की सहायता से राज्यश्री को खोज निकाला और सती होने से बचाया। और उसे कन्नौज लेकर आया तब सर्वसम्मति से वो कन्नौज का भी शासक बन गया। 

इस तरह से उसकी राजधानी थानेश्वर से कन्नौज आ गयी। 

कन्नौज 

सातवी सदी तक >> पाटलीपुत्र के बुरे दिन आ गए और कन्नौज का सितारा चमका। 

कन्नौज >> ऊंची जगह पर स्थित >> दोआब के बीच स्थित >> किलाबंदी करना आसान था >> 7वी सदी में उसकी उत्तम ढंग से किलाबंदी की गयी >> पूर्वी और पश्चिमी दोनों बाजुओं पर नियंत्रण >> जल और स्थल दोनों मार्गों से आ जा सकते थे 

वाणभट्ट = हर्ष का दरबारी कवि >> हर्षचरित नामक पुस्तक लिखी

हुआन सांग = चीनी यात्री जो 7वी सदी में भारत आया और 15साल रहा

हर्ष = भारत का अंतिम हिन्दी सम्राट >> न कट्टर हिन्दू और न ही सारे देश का शासक

पूर्वी भारत में हर्ष ने गौड़ के शैव शासक शशांक जिसने बोधगया में बोधिवृक्ष का काट डाला था, से मुक़ाबला किया >> 619 ई में शशांक की मृत्यु के बाद यह शत्रुता समाप्त हुई

हर्ष ने गौड़ शासक शशांक को हराया । 

दक्षिण भारत में हर्ष के अभियान को नर्मदा के किनारे चालुक्य वंश के राजा पुलकेशिन ने रोका

राजा पुलकेशिन = आधुनिक कर्नाटक और महाराष्ट्र के बड़े भू भाग पर राज करता था >> राजधानी = कर्नाटक के बीजापुर जिले के बादामी में

हर्ष का राज्य कश्मीर को छोड़ कए उत्तर भारत तक ही सीमित था
हर्ष ने कश्मीर पर आक्रमण कर के वहाँ से बुद्द का दांत लाकर कन्नौज के निकट एक संघाराम में स्थापित किया।

चीन के साथ हर्ष ने मित्रता की और 641 ई में वहाँ अपने दूत भेजे । 643 और 646 ई में दो चीनी दूत उसके दरवार में आए ।

प्रशासन 

गुप्त वंशियों के ढर्रे पर शासन किया

शासन अधिक सामंतिक और विकेंद्रित था। इस कारण परमभट्टारक , महाराजाधिराज,  सकलोत्तरपथेश्वर,चक्रवर्ती , सार्वभौमपरमेश्वर , परममाहेश्वर जैसी उपाधियाँ थी 
हर्ष के पास 100,000 घोड़े और 60,000 हाथी थे (मौर्यो के पास केवल 30,000 घोड़े और 9,000 हाथी थे) >> यह सभी सामंतों से सहयोग प्राप्त करने पर ही संभव था >> हरेक सामंत सामंत एक निर्धारित पैदल सैनिक और घोड़े देता था >> इस तरह उसने अपनी सही सेना को आकार में विशाल बनाया ।

हर्ष की सेना  को चतुरंगिणी कहा जाता था, जिसमे पैदल, घुड़सवार, रथ और हाथी की टुकड़ियाँ थी। 

अवन्ती : युद्द और शांति का मंत्री 
सिंहनाद : सेना का प्रधान 
कुंतल : घुड़सवार सेना का प्रधान 

राज्य को सर्वाधिक आय भूमि से ही मिलती थी। उपज का 6th भाग कर के रूप मे  लिया जाता था । 


भोगिक :- कर वसूलने वाला 
पुस्तपाल :- जमीन का हिसाब रखने वाला 


पुरोहितों को भूमिदान दिया जाता था

पदाधिकारियों को सनद (शासन पत्र ) द्वारा जमीन दी जाती थी >> इन सब की रियायतें अनुदान भोगी जैसी ही थी

राजकीय आय के चार हिस्से होते थे :

1. एक राजा के खर्च के लिए

2. एक विदयवानों के लिए

3. पदाधिकारियों और अमलों के बंदोबस्त के लिए

4. धार्मिक कार्य के लिए

हर्ष के अधिक  मात्र में सिक्के नहीं मिलते >> क्योंकि अधिकारियों को वेतन और पुरस्कार के रूप में भूमि देने की सामंती प्रथा हर्ष ने ही शुरू की

विधि व्यवस्था अच्छी नहीं थी >> हुआन सांग की सुरक्षा के प्रबंध के वावजूद उसके माल सब छीन लिया गया था

अपराध के लिए कड़ी सजा का प्रावधान >> डकैती राजद्रोह था >> उसके लिए डाकू का दायाँ हाथ काट दिया जाता था

बौद्द धर्म का प्रभाव >> दंड की कठोरता कम की गयी >> आजीवन कारीवास दिया जाने लगा

हुयान सांग (भारत में 629 – 645) (शिलादित्य)

hwansang chinese traveller

चीनी यात्री >> भारत भ्रमण किया

नालंदा महाविहार में पढ़ने और भारत से बौद्द ग्रंथ बटोर कर ले जाने आया था

नालंदा महाविहार = बौद्द विश्वविधालय >> बिहार के आधुनिक नालंदा जिले में

हर्ष के दरबार में कई वर्ष रहा , हर्ष ने हुयान सांग  को शिलादित्य  कहा था

इसकी कारण हर्ष बौद्द धर्म का महा समर्थक हो गया >> बौद्द धर्म के लिए दान दिये

इसने तत्कालीन लोगों के आर्थिक और सामाजिक जीवन पर तथा तत्कालीन धार्मिक संप्रदाय पर लिखा

इसके अनुसार पाटलीपुत्र पतनावस्था में था >> प्रयाग और कन्नौज महत्वपूर्ण हो गए थे

सामंत और पुरोहित >> जीवन विलासमय था

ब्राह्मण और क्षत्रिय >> सादा जीवन था >> खेती करने लगे

 इसने शूद्रो को कृषक कहा है

मेहतर और चांडालों पर नजर डाली >> अछूत लोग >> गाँव के बाहर बसते थे >> लहसुन प्याज खाते थे >> नगर में प्रवेश के पहले ज़ोर ज़ोर से आवाज करते थे ताकि लोग उनके स्पर्श से बचे रहे




बौद्द धर्म और नालंदा 

nalanda 

चीनी यात्री के समय बौद्द लोग = 18 संप्रदाय में बंटे हुए थे

सबसे विख्यात = नालंदा महाविहार >> बौद्द भिक्षुओं को शिक्षित करने के लिए एक महाविध्यालय था >> 10,000 छात्र थे >> सभी बौद्द भिक्षु थे >> महायान संप्रदाय का बौद्द दर्शन पढ़ाया जाता था
जितने भवन खुदाई में निकले हैं >> ये 10,000 भिक्षुओं के रहने के लिए पर्याप्त नहीं हैं

ई-त्सिंग = एक अन्य चीनी यात्री >> 670 में नालंदा में आया था >> इसके अनुसार >> केवल 3000 भिक्षु रहते थे

नालंदा विश्वविधालय का भरण पोषण 100 गाँव के राजस्व से होता था (हुआन सांग के अनुसार) >> ई-त्सिंग के अनुसार 200 गाँव से

हर्ष के काल में नालंदा एक प्रसिद्द बौद्द विहार था

धार्मिक  नीति 

1. हर्ष शुरू में शैव था पर धीरे धीरे बौद्द का महान संपोषक हो गया

2. कन्नौज में महायान के सिद्दांतों के प्रचार के लिए एक विशाल सम्मेलन कराया

3. हुआन सांग और कामरूप के राजा भास्करवर्मन के साथ बीस देशो के राजा और विभिन्न संप्रदायों के कई हजार पुरोहित पधारे

4. फूस के दो बड़े बड़े घर बनाए गए >> हर एक में हजार हजार लोग टिक सकते थे

5. एक विशाल मीनार बनाई गयी जिसके मध्य में बुद्द की स्वर्ण प्रतिमा बनाई गयी >> प्रतिमा की ऊंचाई हर्ष की ऊंचाई जितनी ही थी

6. हर्ष ने इस प्रतिमा की पुजा की और सार्वजनिक भोज दिया

7. सम्मेलन में शास्त्रार्थ का आरंभ हुआन सांग ने किया >> उसने महायान संप्रदाय के सदगुणो का प्रतिपादन किया और बोला की कोई आकर उसके तर्कों का खंडन करे >> पर पाँच दिन तक कोई खड़ा नहीं हो पाया >> तब उसको जान से  मारने की गयी

8. अचानक इस मीनार में आग लग गयी और हर्ष पर घातक हमला किया गया

9. 500 ब्राह्मणो को गिरफ्तार किया गया >> कुछ को निर्वासित किया गया और कुछ को मौत की सजा दी गयी

10. कन्नौज के बाद उसने प्रयाग में महासम्मेलन बुलाया >> सभी सामंत, मंत्री, सभ्य आदि लोग शामिल हुए >> बुद्द की प्रतिमा का पूजन हुआ >> हुआन सांग ने प्रवचन किया >> अंत में हर्ष ने बड़े बड़े दान किया और अपने शरीर के वस्त्रो को छोड़कर सभी वस्तुओं का दान किया >> हुआन सांग ने हर्ष की प्रशंसा की 

11. कुम्भ मेले को प्रारम्भ करने का श्रेय हर्षवर्धन को ही जाता है 

साहित्य 

बाणभट्ट = हर्ष का वर्णन अपनी पुस्तक हर्षचरित में किया है >> चाटुकारिता पूर्ण चित्रण किया है

हर्ष द्वारा रचित = प्रियदर्शिका, रत्नावली, नागानंद

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