जैन धर्म : दर्शन, सिद्धान्त और साहित्य

महावीर स्वामी और उनका दर्शन 

जैन दर्शन-


जैन धर्म का मानना है कि सृष्टि अनादिकाल से चलती रही है और अनन्त काल तक चलेगी। 

इस तरह हम देखते हैं जैन धर्म, हिन्दू धर्म या बौद्ध धर्म की तरह सृष्टि के विनाश में विश्वास नहीं करता। 

वैसे ईश्वर के अस्तित्व को नहीं नकारा गया किन्तु ईश्वर को जिन के नीचे रखा गया। उनके विचार में ईश्वर सृष्टि का निर्माण, उसकी रक्षा और विध्वंस के लिए उत्तरदायी नहीं हैं। 

अतः सृष्टि कुछ शाश्वत कानूनों के द्वारा परिचालित होती है। इस शाश्वत विश्व में अनेक चक्र होते हैं। उत्थान काल को उत्सर्पिणी और पतन के काल को अवसर्पिणी कहते हैं। 

उत्सर्पिणी के चक्र में 63 शलाका पुरुष पैदा होते हैं। इनमें 24 तीर्थकर एंव 12 चक्रवर्ती शासक शामिल होते हैं।

बौद्धों की तुलना में यह धर्म आस्तिक है, वैसे नास्तिक है। यह धर्म सांख्य दर्शन के सबसे करीब पड़ता है। 

इनके विचार में जीव और अजीव के संयोग से सृष्टि का निर्माण होता है। उसका मानना है कि आत्मा केवल पशुओं पेड़-पौधों में नहीं होती वरन् पहाड़, झरने और अन्य प्राकृतिक वस्तुओं में होती है। 

आत्मा में एक प्रकार का प्राकृतिक तेज विद्यमान रहता है। यह सर्वज्ञाता एवं शक्तिमान होती है। आत्मा कर्म के आवरण से ढक जाती है और इसी कर्म (पुद्गल) के कारण आत्मा में बदलाव आ जाता है। 

विभिन्न क्रियाओं के कारण कर्म आत्मा से जुड़ जाता है। क्रूर कार्यों से बुरे प्रकार का कर्म पैदा होता है। इसलिए आत्मा भी बुरी हो जाती है। 

कर्म के कारण ही पुनर्जन्म की प्रक्रिया चलती रहती है। जब कर्म-पदार्थ आत्मा में उतर जाता है तब वह कर्म की आठ प्रकृतियों में रूपांतरित हो जाता है। 

जैन धर्म में आठ प्रकार के कर्मों की कल्पना है। 

जब आत्मा में यह कर्म घुल-मिल जाता है तो आत्मा में एक प्रकार का रंग उत्पन्न करता है जो साधारण आंख से नहीं दिखाई देता है। 

इस रंग को लेस्य कहा जाता है और यह (लेस्य) छः प्रकार का होता है- 

(1) काला, 
(2) नीला, 
(3) धूसर, 
(4) पीला, 
(5) लाल और 
(6) सफेद। 

किसी भी व्यक्ति का लेस्य उसके चरित्र का सूचक होता है। उनमें से पहले तीन लेस्यों का संबंध बुरे चरित्र से है और शेष तीन का संबंध अच्छे चरित्र से है। 

जैन सिद्धांत का उद्देश्य जीव में अजीव का प्रवेश (आश्रव) रोकना है और जो प्रवेश हो चुका है उसे निकालना है। 

पहली क्रिया को संबर और दूसरी क्रिया को निर्जरा कहा जाता है। 

उपनिषद् के विपरीत, जैन धर्म की मान्यता है कि आत्मा की शुद्धि, लम्बे समय तक उपवास, अहिंसा और इन्द्रियनिग्रह द्वारा संभव है।

अनेकान्तवाद- यह सप्तभगी न्याय के नाम से भी जाना जाता है। इसका मानना है कि सत्य एक है और एक से अधिक है, स्थिर है, परिवर्तनशील है।

स्यादवाद- यह अनेकान्तवाद से जुड़ा हुआ दर्शन है। इसका मानना है कि कोई बात सोच समझकर कहनी चाहिए, क्योंकि तथ्य इससे विपरीत भी हो सकता है।

अनंत चतुष्टय 

जब जीव से कर्म का अवशेष बिलकुल समाप्त हो जाता हैं तब वह मोक्ष को प्राप्त कर लेता हैं। मोक्ष के बाद जीवन के आवागमन के चक्र से मुक्ति मिल जाती हैं तथा वह अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन , अनंत वीर्य तथा अनंत सुख की प्राप्ति कर लेता हैं । इसे ही जैन शास्त्रों में अनंत चतुष्टय की संज्ञा दी गयी हैं । 

सम्यक् ज्ञान के पाँच प्रकार- 

जैन चिन्तन में सम्यक् ज्ञान के पाँच प्रकार बताए गए हैं। ये इस प्रकार हैं-
मति   (इन्द्रियों द्वारा अनुभूत)।
अवधि (कहीं रखी गई वस्तु का अतिमानवी और दिव्य ज्ञान)।
श्रुति (सुनकर प्राप्त ज्ञान)।
मनः पर्याय (दूसरे के हृदय और मस्तिष्क की बातों का बोध होने का ज्ञान)।
केवल्य (पूर्ण ज्ञान जो परिब्राजकों और निग्रन्थों को प्राप्त है)।

जैन मत के अनुसार ज्ञान के तीन स्त्रोत हैं ;
1. प्रत्यक्ष
2. अनुमान
3. तीर्थकरों के प्रवचन


कैवल्य

जब जीवन से कर्म का अवशेष बिलकुल समाप्त हो जाता हैं तब वह मोक्ष की प्राप्ति (कैवल्य) कर लेता हैं ।

जैन धर्म में सिर्फ संघ के सदस्यों के लिए कैवल्य का नियम हैं , सामान्य जन के लिए नहीं

सामान्य जन या गृहस्थों को भिक्षु जीवन में प्रवेश करने से पूर्व 11 कोटियों से गुजरना पड़ता है

महावीर स्वामी को कैवल्य की प्राप्ति होने के बाद ही जिन (विजेता), अर्ह (योग्य), निर्ग्रंथ (बंधन रहित) जैसी उपाधियाँ मिली ।

जैन धर्म पुनर्जन्म व कर्मवाद में विश्वास करता हैं । यह वेद की अपौरुषयेता तथा ईश्वर के अस्तित्व को अस्वीकार करता हैं ।


सल्लेखना 

= सत + लेखना = अच्छाई का लेखा जोखा

सल्लेखना का संदर्भ उपवास द्वारा प्राण त्याग के लिए होता हैं

संथारा प्रथा 

जब किसी व्यक्ति को लगता हैं कि वह मृत्यु के निकट हैं तो वह एकांतवास ग्रहण कर लेता हैं और अन्न जल त्याग देता हैं  और इसके बाद वह देह त्याग देता हैं

राजस्थान कोर्ट ने अगस्त  2015 में संथारा प्रथा पर रोक लगा दी थी , परंतु सुप्रीम कोर्ट ने जैन समुदाय से जुड़े संगठनों की याचिका पर राजस्थान कोर्ट के फैसले पर रोक लगा थी । 

जैन धर्म में प्रचलित कुछ शब्द 

  1. जीव- जैन दर्शन में आत्मा के लिए "जीव" शब्द का प्रयोग किया गया हैं। आत्मा द्रव्य जो चैतन्यस्वरुप है। [3]
  2. अजीव- जड़ या की अचेतन द्रव्य को अजीव (पुद्गल) कहा जाता है।
  3. आस्रव - पुद्गल कर्मों का आस्रव करना
  4. बन्ध- आत्मा से कर्म बन्धना
  5. संवर- कर्म बन्ध को रोकना
  6. निर्जरा- कर्मों को क्षय करना
  7. मोक्ष - जीवन व मरण के चक्र से मुक्ति को मोक्ष कहते हैं।


जैन साहित्य 

प्राचीनतम जैन ग्रंथपूर्व कहे जाते थे। माना जाता है कि इन ग्रंथों की जानकारी केवल भद्रबाहु की थी। जब भद्रबाहु दक्षिण की ओर चला गया, तो स्थूलबाहु के नेतृत्व में एक सभा आयोजित की गई। 

इस सभा में 14 पूर्वो का स्थान 12 अंगों ने ले लिया। 14 पूर्वो में महावीर द्वारा प्रचारित सिद्धांत संग्रहीत हैं। 

स्वयं महावीर ने इसे अर्द्ध-मागधी प्राकृत भाषा में अपने शिष्यों तक पहुँचाया।

जैन साहित्य प्राकृत एवं संस्कृत भाषा में मिलते हैं जबकि प्रांरभिक जैन साहित्य अर्द्ध-मागधी में लिखे गए थे । बाद में जैन धर्म ने प्राकृत भाषा को अपनाया । कालांतर में जैनियों ने शौरसेनी, संस्कृत, और कन्नड भाषा में साहित्य को लिखा ।

जैन साहित्य को आगम कहा जाता हैं जिसमें 12 अंग, 12 उपांग, 10 प्रकीर्ण, 6 छेदसूत्र, 4 मूलसूत्र, 1 नंदी सूत्र और 1 अनुयोगद्वार हैं । इन ग्रन्थों को श्वेतांबर संप्रदाय के आचार्यों द्वारा महावीर स्वामी कि मृत्यु के बाद लिखा गया ।

जैन ग्रंथ के आचारांगसूत्र में जैन भिक्षुओं के आचार नियम व विधि निषेधों का विवरण, भगवती सूत्र में महावीर के जीवन , न्यायधम्मकहासुत में महावीर की शिक्षाओं का संग्रह तथा उवासगद्साओ में हुण शासक तोरमाण तथा भद्रबाहुचरित्र से चन्द्रगुप्त मौर्य के राज्य काल कि घटनाओं के बारे में प्रकाश पड़ता हैं

भद्रबाहु ने कल्पसूत्र को संस्कृत में लिखा हैं जिसमें तीर्थकरों का जीवन चरित्र हैं ।

भगवती सूत्र महावीर कि जीवन पर प्रकाश डालता हैं तथा इसमें 16 महजनपदों का उल्लेख मिलता हैं

जैन धर्म के सिद्धान्त 

1. दार्शनिक सिद्धान्त 
a) अनीश्वरवर वाद
b) कर्मवाद
c) आत्मवाद
d) निर्वाण
e) पुनर्जन्म

2. व्यावहारिक सिद्धान्त 
a) पाँच महाव्रत
b) अनुव्रत

3. सामाजिक सिद्धान्त 
a) नारी स्वातंत्र्य
b) आचार नग्नता
c) पाप

जैन धर्म में 8 पापों की कल्पना की गयी हैं 

जैन संगीतियाँ 

महावीर स्वामी के समय में जैन धर्म का सबसे अधिक प्रसार हुआ । महावीर से समकालीन शासक जो जैन धर्म के अनुयायी थे , वे थे :

     बिंबिसार , चन्द्प्रघोट, अजातशत्रु, उदायिन , दधिवाहन, एवं चेटक 

मौर्य वंश के शासक चन्द्रगुप्त मौर्य भी जैन धर्म के अनुयायी था । संप्रति ने जैन आचार्य सुहास्ति से शिक्षा ली थी । चन्द्रगुप्त मौर्य के समय में पाटलीपुत्र में प्रथम जैन संगीति का आयोजन हुआ

कलिंग नरेश खारवेल भी जैन धर्म का अनुयायी था । उदयगिरि पहाड़ी में इसने जैन भिक्षुओं के लिए एक गुफा का निर्माण कराया था

Udayagiri Caves


bahubali gomateshwar
राष्ट्रकूट, गंग, गुजरात के चालुक्य एवं चंदेल शासकों ने भी जैन धर्म को प्रश्रय दिया ।

राष्ट्रकूट शासक अमोघवर्ष जैन धर्म का अनुयायी था , इसने रत्नमालिका नामक ग्रंथ की रचना की ।

गंग वंश के राजा राजमल चतुर्थ का मंत्री और सेनापति चामुंड राय ने 974 ई में एक बाहुबली जिन की मूर्ति (गोमतेश्वर) का निर्माण श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) में कराया । यहाँ पर प्रत्येक 12 वर्ष में महामस्तकाभिषेक किया जाता हैं ।

महावीर की शिक्षाओं को संकलित करने के लिए दो जैन सभाओं का आयोजन किया गया ।

प्रथम संगीति 
कब : 322 ई पू
कहाँ : पाटलीपुत्र (बिहार)
अध्यक्ष : स्थूलभद्र
परिणाम :
1. बिखरे एवं लुप्त प्राय: ग्रन्थों का संचयन,
2. 12 अंगों का संकलन ,
3. जैन धर्म का दो संप्रदायों में विभाजन

द्वतीय संगीति 
कब : 513 या 526  ई पू
कहाँ : वलभ्भी (गुजरात)
अध्यक्ष : देवर्धी क्षमाश्रमण
परिणाम :
1. कुल 11 अंगों  को लिपिवद्ध किया गया 




No comments